सबसे अच्छा धान का बीज कौन सा है

पूरी दुनिया में धान एक ऐसी फसल है जो मक्का के बाद सबसे अधिक उगाया जाता है। यह एक ऐसी फसल होती है जिसके अंदर से चावल को निकाला जाता है। चावल को भारत में ही नहीं बल्कि एशिया के सभी देशों में और दूसरे देशों में भी मुख्य भोजन के तौर पर जाना जाता है। यही वजह है कि धान की फसल की खेती किसान बहुत ज्यादा करते हैं। हमारा देश भारत विश्व में चीन के बाद चावल का उत्पादन करने में दूसरे नंबर पर आता है। अगर धान का बीज अच्छा होगा तो उससे चावल ज्यादा निकलेंगे। आज के इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि सबसे अच्छा धान का बीज कौन सा है? इसके अलावा धान से संबंधित सभी महत्वपूर्ण बातें भी विस्तार में बताएंगे।

धान की किस्मों के नाम

वैसे तो धान की खेती में कई तरह की किसमें होती हैं जिन्हें स्थान के हिसाब से सुना जाता है। हमारे देश भारत में धान की बहुत सारी किस्में हैं जिनको हर राज्य की जलवायु के अनुसार बोया जाता है। हम कुछ मुख्य धान की किस्मों के नाम बता रहे हैं जो कि निम्नलिखित हैं

  • पूसा 1460
  • पूसा सुगंध 3
  • पूसा सुगंध 4
  • डब्ल्यू जी एल 32100
  • डी आर आर धान 310
  • डी आर आर धान 45
  • एम टी यू 1010
  • आई आर 64
  • आई आर 36

उत्तर प्रदेश में धान की किस्म

उत्तर प्रदेश में जो धान की किस्में बोई जाती हैं उनके बारे में जानकारी इस प्रकार से है

  • नरेंद्र 97
  • ·       साकेत 4
  • ·   बरानी दीप
  • ·       शुष्क सम्राट
  • ·       लालमनी
  • ·       मनहर
  • ·       पूसा 169
  • ·       नरेंद्र 80
  • ·       पंत धान 12
  • ·       मालवीय धान 3022
  • ·   प्रसाद
  • ·       बाला
  • ·       नगीना 221
  • ·       जया
  • ·       सरजू 49
  • ·       सरजू 50

धान कितने प्रकार के होते हैं

अगर हम बात करें कि धान के कितने प्रकार होते हैं तो धान के सैकड़ों प्रकार होते हैं। कुछ धान जल्दी पकने वाली होती हैं और कुछ देर से पकती हैं। इस तरह से धान के प्रकार हर क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं जैसे कि जल्दी पकने वाली धान में पूसा 169, पंत धान 12, नरेंद्र धान 2065, नरेंद्र 80, मालवीय धान 3022 शामिल होती हैं। वही धीरे और मध्यम पकने वाली धान में सरजू 52, पंत धान 4, नरेंद्र 359, नरेंद्र 2064, पूसा 44 इत्यादि कुछ मुख्य प्रकार हैं।

60 दिन में पकने वाली धान

सठिया धान 60 से 70 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इसके दानों की अगर बात करें तो इस के दाने बहुत ज्यादा मोटे होते हैं और यह रबी सीजन की धान है।

90 दिन वाली धान

वंदना आर आर 167-982 तेजी के साथ पकने वाली धान है। इस 90 दिन वाली धान का दाना लंबा और मोटा होता है। इस धान की प्रजाति को सबसे पहले साल 1992 में झारखंड के छोटा नागपुर पठार में बोया गया था।

रिसर्च धान की किस्म

रिसर्च धान के अंतर्गत धान की बहुत सी किस्में आती हैं। रिसर्च धान की किस्म में से निकलने वाले चावल खाने में बहुत ही ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं और बहुत ही सुगंधित होते हैं। ऐसे इलाके जहां पर जमीन समतल होती है और पानी की सिंचाई का साधन कम होता है वहां पर रिसर्च धान की किस्म के चावल लगाए जा सकते हैं। रिसर्च धान के अंतर्गत विक्रम, धनरेखा, दामिनी, मोती गोल्ड, एमपीआर 707 इत्यादि किस्में आती हैं।

धान के बीज नाम | 12 धान के नाम

धान जैसी महत्वपूर्ण फसल के बीज कई तरह के होते हैं क्योंकि हर जगह की जलवायु और वातावरण एक जैसा नहीं होता है। ऐसे में अगर आप 12 धान के नाम जानना चाहते हैं तो हम निम्नलिखित धान के बीज नाम बता रहे हैं जो कि इस तरह से हैं

पूसा सुगंध 3

पूसा सुगंध 3 धान के दाने बहुत सुगंधित होते हैं और पतले होते हैं। इस किस्म को पकने में 120 से लेकर 125 दिन लगते हैं। इसके अलावा इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 40-45 क्विंटल तक होता है। पूसा सुगंध 3 की खेती मुख्य रूप से बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में की जाती है।

जया धान

जया धान कम ऊंचाई वाली उन्नत किस्म है जिसमें चावल के दाने सफेद और लंबे निकलते हैं। जया धान को पकने में लगभग 130 दिन का समय लगता है। इसका पौधा तकरीबन 82 सेंटीमीटर तक लंबा होता है। इसकी पैदावार 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। जया धान को भारत के सभी राज्यों में उगाया जा सकता है।

मकराम

मकराम धान की एक बहुत ही अच्छी पैदावार वाली किस्म है और इसमें से जो दाने निकलते हैं वह मीडियम साइज के होते हैं। मकराम धान तकरीबन 160 से लेकर 175 दिन में पक जाती है। इसका जो पौधा होता है वह लगभग 111 सेंटीमीटर तक का होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर रोग और रस चूसने वाले कीड़ों का बिल्कुल भी असर नहीं पड़ता है। मकराम धान की अगर एवरेज पैदावार की बात करें तो इससे 52 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार मिल जाती है।

बासमती 370

बासमती 370 धान की किस्म का पौधा लंबा होता है और इसमें से निकलने वाले चावल के दाने सफेद रंग के होते हैं। बासमती 370 के पौधे की ऊंचाई लगभग 140 सेंटीमीटर से लेकर 150 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी फसल 150 दिनों में पक जाती है और इसकी एवरेज पैदावार 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। बासमती 370 की खेती आमतौर पर हरियाणा के राज्यों में की जाती है।

डी आर आर 310

डी आर आर 310 धान की एक बहुत ही अच्छी पैदावार वाली किस्म है। इसमें से निकलने वाले चावल के दाने मध्यम साइज के होते हैं और उनका रंग सफेद होता है। डी आर आर 310 धान के पौधों की ऊंचाई 90 सेंटीमीटर से लेकर 95 सेंटीमीटर तक हो सकती है और इसकी फसल लगभग 125 से लेकर 130 दिन में पक जाती है। इस तरह के धान की खेती पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, एमपी, केरल और बिहार जैसे राज्यों में ज्यादा की जाती है।

आई आर 64

आई आर 64 धान में से निकलने वाले चावल के दाने लंबे होते हैं पर इसका जो पौधा होता है वह बहुत छोटा होता है। यह धान 120 दिन से लेकर 125 दिनों के अंदर पक कर रेडी हो जाती है। आई आर 64 धान की खेती करके प्रति हेक्टेयर 50 से लेकर 55 क्विंटल तक इसका उत्पादन किया जा सकता है। इसकी खेती मुख्य रूप से गोवा, उड़ीसा, यूपी, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक में की जाती है।

सी एस आर 10

सी एस आर 10 धान का पौधा बहुत छोटा होता है और इसमें से निकलने वाले दाने छोटे होने के साथ-साथ सफेद रंग के होते हैं। अगर इसके पौधे की ऊंचाई की बात की जाए तो इनकी ऊंचाई 80 सेंटीमीटर से लेकर 5 सेंटीमीटर तक हो सकती है। सी एस आर 10 की एवरेज पैदावार 55 से लेकर 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। इस प्रकार के धान की खेती उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, गोवा, गुजरात और उड़ीसा ऐसे राज्यों में मुख्य रूप से की जाती है।

एन डी आर 359

एन डी आर 359 धान की किस्म की पैदावार से निकलने वाले चावल के दाने छोटे होते हैं। पौधे की ऊंचाई 90 सेंटीमीटर से लेकर 95 सेंटीमीटर तक हो सकती है। इस धान की पैदावार को पकने में 115 से लेकर 225 दिन का समय लगता है। धान की एवरेज पैदावार 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। मुख्य रूप से इसकी खेती यूपी, उड़ीसा और बिहार जैसे राज्यों में की जाती है।

पी एच बी 71

पी एच बी 71 धान की पैदावार से निकलने वाले दाने चमकीले, लंबे और सफेद रंग के होते हैं। इसकी फसल को पकने में 130 से लेकर 135 दिन तक का टाइम लगता है। पी एच बी 71 पौधे की ऊंचाई 115 सेंटीमीटर से लेकर 120 सेंटीमीटर तक हो सकती है। इसकी एवरेज पैदावार 87 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है। मुख्य रूप से इसकी खेती उत्तर प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु और कर्नाटक में की जाती है।

हाइब्रिड 620

हाइब्रिड 620 धान की यह किस्म अच्छी पैदावार वाली है और इसमें से चावल के दाने निकलते हैं वो लंबे और चमकदार होते हैं। इसकी फसल को पकने में 125 से लेकर 130 दिन का टाइम लगता है। हाइब्रिड 620 की पैदावार 62 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।

धान की खेती में खाद

धान की खेती में खाद का बहुत महत्वपूर्ण रोल होता है और इसके लिए केवल रसायनिक खादों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। रसायनिक खादों के साथ-साथ धान की फसल में ऑर्गेनिक खाद भी डालनी चाहिए। सबसे पहले खेत की जुताई करनी चाहिए और उसके बाद लगभग एक एकड़ क्षेत्र में सढ़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए। रोपाई के समय 100 किलोग्राम बीएसपी डालनी चाहिए और इसके अलावा 50 किलोग्राम पोटाश, 50 किलोग्राम डीएपी 25 किलोग्राम यूरिया डालना चाहिए। रोपाई के 15 दिन के बाद एक बार फिर 25 किलोग्राम यूरिया धान की खेती में डालना चाहिए और इसके साथ में 3 किलोग्राम सल्फर भी डालना चाहिए। इस तरह से रोपाई के 45-50 दिन के बाद 25 किलोग्राम यूरिया और 8 किलोग्राम जिंक खेत में डालना चाहिए। जब धान की बालियां निकलने लगें तो तब उन पर एनपीके 0050 का छिड़काव करना चाहिए।

धान काटने वाली मशीन | धान कटाई मशीन

जब धान की फसल तैयार हो जाती है तो जो छोटे किसान होते हैं वह हंसिया की मदद से अपनी फसल को आराम से काट लेते हैं। पर बड़े किसानों को धान काटने वाली मशीन की जरूरत होती है जिससे वे अपने खेतों में धान की कटाई कर सकें। तो धान की फसल को काटने के लिए रीपर मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। यह धान कटाई मशीन बहुत ही थोड़े से समय में धान की फसल को काट देती है।

धान की खेती का समय

धान की खेती करने के लिए सबसे अच्छा समय जून के मध्य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक होता है। यह धान की खेती का समय सबसे उपयुक्त है और किसानों को चाहिए कि इसी दौरान वे अपने खेतों में धान की बुवाई की तैयारी करें।

धान के खरपतवार के नाम

धान फसल को रोग और कीट तो नुकसान पहुंचाते ही हैं लेकिन इसके अलावा खरपतवार भी धान को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। अगर इन्हें समय पर काबू ना किया जाए तो तब यह धान की वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं। धान में लगने वाले खरपतवार कई प्रकार के होते हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं

  •  बुलरस
  • ·        गंध वाला मोथा
  • ·        सांवकी
  • ·        होरा घास
  • ·        बूटी
  • ·        कांजी
  • ·        छतरीदार मोथा
  • ·        मकरा
  • ·        फूल बूटी और मिर्च बूटी
  • ·        दादमारी
  • ·        कुसल इत्यादि

धान के पुआल का उपयोग

आमतौर पर किसान धान के पुआल का उपयोग बिल्कुल भी नहीं करते हैं क्योंकि वे इसे जला देते हैं। लेकिन धान के पुआल का अगर सही तरह से इस्तेमाल किया जाए तो किसान इससे भी पैसा कमा सकते हैं। यहां हम धान के पुआल के कुछ उपयोग बता रहे हैं जो कि निम्नलिखित हैं

  • खाद बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • ·        पशुओं के लिए चारा बना सकते हैं।
  • ·        ईधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

धान के रोग एवं कीट

धान की फसल में कई प्रकार के रोग लग जाते हैं जिनके बारे में जानकारी निम्नलिखित इस प्रकार से है

झोंका रोग

झोंका रोग धान की फसल में लगने वाला एक सबसे मुख्य रोग है। यह रोग पायरीकुलेरिया ओराइजी नाम के फफूंद से फैलता है। इस रोग में धान की पत्तियां सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। शुरुआत में इस रोग की वजह से पत्तियों पर धब्बे पड़ने लगते हैं और धीरे-धीरे वह बड़े होकर आंख की तरह हो जाते हैं।

झुलसा रोग अथवा जीवाणु झुलसा

झुलसा रोग अथवा जीवाणु झुलसा ज़ेंथोमोनास ओराइजी नाम के जीवाणु की वजह से होता है। इस रोग की पहचान करना बहुत आसान है क्योंकि इस रूप में पत्तियां सूखने लगती हैं। इस प्रकार से सुखी हुई बालियों में दाने नहीं होते हैं।

भूरा धब्बा रोग

भूरा धब्बा रोग धान का एक ऐसा रोग है जिसमें पत्तियों पर अंडाकार या फिर गोलाकार में गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनने लगते हैं। इस रोग की वजह से पत्तियां झुलसने लगती हैं। यह रोग आमतौर पर धान की फसल में पौधे निकलने से लेकर दाने बनने तक के दौरान होता है।

खैरा रोग

खैरा रोग जस्ता की कमी की वजह से होता है और इसकी वजह से पौधे की निचली सतह की जो पत्तियां होती हैं वो पीली होने लगती हैं। बाद में यह पीली पत्तियां कत्थई रंग में बदल जाती हैं और फिर पीली पड़ जाती हैं। खैरा रोग होने पर धान की फसल के कल्ले बहुत कम निकलते हैं और इसके अलावा पौधों की बढ़ने की गति भी रुक जाती है।

धान के ताजा भाव

यदि आप धान के ताजा भाव जानना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अपने राज्य की धान मंडी में जाना होगा जैसे कि बुलंदशहर, सिकंदराबाद धान मंडी, दादरी धान मंडी, एटा बासमती, बिलासपुर धान मंडी इत्यादि। जानकारी के लिए बता दें कि जब भी धान मार्केट में आता है तो तब शुरू में उसके रेट ज्यादा होते हैं लेकिन कुछ समय बाद धान के रेट फिर बड़ जाते हैं। तो धान के रेट जानने के लिए धान की प्रमुख मंडियों में जाकर पता करना बेहतर रहता है।

धान में खरपतवार नाशक दवा

धान में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए जो दवाइयां इस्तेमाल की जाती हैं उनके नाम निम्नलिखित इस प्रकार से हैं

  • ब्यूटाक्लोर
  • 2.      ओक्साडायजान
  • 3.      प्रेटीलाक्लोर
  • 4.      पेंटीमैथलिन
  • 5.      एनीलोफास
  • 6.      बैंथीयोकार्ब

धान में लगने वाले कीट

धान की फसल में कई प्रकार के कीट लग जाते हैं जिन को नियंत्रित करना जरूरी होता है। धान में लगने वाले कीट निम्नलिखित हैं

  • पत्ती लपेटक या धान का बंका
  • ·   तना छेदक कीट
  • ·       हिस्पा कीट
  • ·       गंधी कीट
  • ·       सैनिक या काटने वाला कीट

धान में यूरिया की मात्रा

धान में यूरिया डालने से धान की ग्रोथ अच्छी होती है और इस वजह से उत्पादन भी बढ़ता है। इसलिए धान में यूरिया डालना बहुत ज्यादा जरूरी होता है। पर अब सवाल यह है कि आखिर धान में यूरिया की मात्रा कितनी रखनी चाहिए? तो इसके लिए हर जगह के हिसाब से यूरिया डाला जाता है। ‌तो जब धान की फसल की रोपाई हो जाती है तो तब उसमें लगभग 30 किलोग्राम प्रति एकड़ यूरिया डाला जाता है। फिर उसके बाद तकरीबन 21 दिन के बाद 40 किलोग्राम प्रति एकड़ यूरिया धान की खेती में डाला जाता है।

धान में लगने वाले रोग

धान में कई प्रकार के रोग लग जाते हैं जैसे कि

  • भूरी चित्ती रोग
  • ·       झोंका रोग
  • ·       अंगमारी रोग
  • ·   जीवनुज पत्ती रोग·       बकानी रोग

धान में गलन रोग

धान में लगने वाले गलन रोग को रूट वॉट के नाम से भी जाना जाता है। यह रोग आमतौर पर वायरस की वजह से या फिर खेतों में पानी जमा होने के कारण होता है। जब धान में गलन रोग होने लगता है तो तब इस वजह से पौधे की जड़ें गलना शुरू हो जाती हैं। इस प्रकार से जब गलन रोग बढ़ जाता है तो तब पौधे पूरी तरह से सूख जाते हैं।

धान में खैरा रोग

जब मिट्टी में जिंक की कमी होती है तो उसकी वजह से धान में खैरा रोग हो जाता है। खैरा रोग होने पर धान की पत्तियां लाल रंग की या फिर भूरे रंग की होने लगती हैं। इस वजह से पौधे का विकास रुक जाता है।

धान में फुटाव की दवा

धान में उचित फुटाव के लिए 20-25 दिन के बाद लगभग 30 किलोग्राम नाइट्रोजन और 500 ग्राम ह्यूमिक एसिड मिलाकर जमीन में डालना चाहिए। यह धान में फुटाव की बेहतरीन दवा हो सकती है जिसके डालने से पौधों में हरापन आता है और फुटाव भी अच्छे से होता है।

धान में अधिक कल्ले

जब धान की रोपाई हो जाती है तो उसके लगभग 20 से 30 दिन के बाद उसमें से कल्ले फूटने लगते हैं। तो ऐसे में प्रति एकड़ 20 किलो नाइट्रोजन और 10 किलो जिंक की मात्रा धान की खेती में अवश्य दें। ऐसा करने से धान में अधिक कल्ले पाए जा सकते हैं।

धान में फिटकरी के फायदे

धान की फसल में जब फिटकरी का इस्तेमाल किया जाता है तो इसका फसल पर बहुत ही अच्छा असर पड़ता है। धान में फिटकरी के फायदे निम्नलिखित इस प्रकार से हैं

  • तने में छेद नहीं होते जिसकी वजह से धान का पौधा अच्छी तरह से ग्रो करता है।
  • ·        धान के कल्ले अच्छे से फुटकते हैं।
  • ·        फिटकरी धान के पौधे को कई तरह के रोगों से बचाता है जिसकी वजह से पैदावार अच्छी होती है।·        झुलसा रोक की शुरुआत होने में फिटकरी का घोल अगर छिड़क दिया जाए तो इससे पौधा तेजी से बढ़ता है और रोग भी खत्म हो जाता है।

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